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Showing posts from January, 2026

टिड्डा और केंचुआ

बात उस ज़माने की है जब टिड्डा और केंचुआ  दोनों जमीन पर चलते थे |टिड्डा की आदत थी हमेशा उछलना उड़ने की चेष्टा करना | केंचुआ  उस पर हँसता था  | वह कहता था कि वे दोनों जमीन पर रेंगनेवाले जीव हैं | अत: उसे इस तरह की बेवकूफी नहीं करनी चाहिए | उसे भी जमीन पर रेंगना चाहिए और उसकी तरह  मस्त रहना चाहिए | पर टिड्डा उसकी बात कभी नहीं सुना | वह हमेशा उड़ने की कोशिश करता रहा और केंचुआ जमीन पर रेंगता रहा | एक बार टिड्डा ने इतनी जोर की उछाल मारी की वह एक छोटे पेड़ की टहनी पर पहुँच गया | अब टिड्डा  बड़ा खुश हो गया | वह एक टहनी से दूसरी टहनी पर कूदने लगा | केंचुए ने उसे आश्चर्य से देखा | कुछ दिनों बाद बरसात का मौसम आ गया | बरसा होने लगी टिड्डा  उड़ कर पेड़ की पत्तियों में छुप गया | पर केंचुआ भीजने लगा | अपने को बचाने के लिए वह मिट्टी में घुसने की चेष्टा करने लगा | तब से टिड्डा पेड़ पर रहता है और केंचुआ जमीन में |

पर उपदेश बहुतेरे

एक गाँव में एक पंडित और पंडिताईन रहते थे | पंडित जी का बड़ा नाम था | वे जगह जगह प्रवचन  देते थे पर उनकी पत्नी को बहुत अफ़सोस था कि वह उस प्रवचन को नहीं सुन पाती है | एक बार पंडित जी का प्रवचन उन्हीं के गाँव में था | पत्नी ने सोंचा की चूँकि इस बार प्रवचन अपने गाँव में है इस लिए वह जरूर सुन पायेगी प्रवचन | पर उस दिन पंडित जी मछली लाये और उसे बढ़िया से पकाने बोले पत्नी को और प्रवचन देने चले गए | पूरा गाँव चला प्रवचन सुनने पर पंडिताईन न जा पाई | उसे बड़ा अफ़सोस हुआ |  पड़ोसन ने उसे प्रवचन सुनने चलने के लिए पुकारा तब पंडिताईन खुद को रोक न पाई | वह भी यह सोंच कर चल पड़ी पड़ोसन के साथ की वह जल्दी ही लौट आयेगी और खाना बना लेगी | पति के प्रवचन से मुग्ध हो गई पंडिताईन | वे अहिंसा पर वक्तव्य दे रहे थे | उदाहरण दे दे कर समझा रहे थे कि जीव हत्या पाप है | सभी श्रोता मंत्रमुग्ध थे |  पंडिताईन को एकाएक ख्याल आया कि उसे तो घर में खाना भी बनाना है | वह जल्दी जल्दी लौट पड़ी घर | पंडिताईन के सिर में पति के प्रवचन का इतना प्रभाव पड़ा कि उसने मछली उठा कर घर से बाहर फेंक दी और सादा खाना बना लिया | पंडित ...

ढेला पत्ता

ढेला पत्ता दोनों मित्र थे | आंधी आने पर ढेला पत्ते पर बैठ जाता था और उसे उड़ जाने से बचा लेता था |बर्षा आने पर पत्ता ढेले पर बैठ जाता था और ढेला गलने से बच जाता था | एक बार ढेला और पत्ता दोनों झगड़ पड़े दोनों ने एक दूसरे को सीख देने की ठानी | एक दिन जोर की आंधी आयी | ढेला पत्ते पर नहीं बैठा | पत्ता राम उड़ गए | दूसरे दिन जोर की आंधी आयी | ढेला राम गल गए |

चांद

चाँद ,  सूरज और हवा तीनों भाई बहन थे | उनकी माँ गरीब थी | एक बार उनकी धनी मौसी ने उन्हें अपने घर खाने पर बुलाया | तीनों भाई बहन खुश हो गए | आज के दिन उन्हें बढ़िया खाना मिलेगा | माँ ने उन्हें खुशी मन से भेज दिया बहन के घर | शाम को वे जब लौटे तो बड़े प्रसन्न थे | माँ ने पूछा कि क्या मिला वहाँ खाने में | बेटे सूरज और बहन हवा ने खाने की बड़ी प्रशंसा की | उन्होंने  कहा माँ वहाँ बड़ा अच्छा खाना बना था |वे उसे खा कर आज बहुत खुश हैं  | चाँद ने कहा की माँ खाना सच में बहुत अच्छा था | अपने खाने में से थोड़ा खाना छुपा कर तुम्हारे लिए भी लाया हूं | तुम खा कर देखो | माँ खा कर तृप्त हुई | उसने  चाँद को गले से लगा लिया और कहा आज जिस तरह तुमने सुख पहुंचाया है | तुम बहुत  बड़े बनोगे | तुम्हे देख कर लोग प्रसन्न  होंगे | तुम्हारी एक झलक पाने के लिए लोग अपने अपने घरों से निकल जायेंगे | सूरज , हवा को देखते ही लोग अपने घरों में छुप जायेंगे | तब से जब सूरज अपनी प्रखरता पर होता है और हवा खूब अपनी शक्ति दिखाती है तब लोग अपने अपने घरों में छुप जाते हैं | लेकिन चाँद जब अपनी पूर्णता म...

बैंगन का भरता

एक संयुक्त परिवार था | घर में चार बहुरानियाँ थीं | छोटी बहू का मन बहुत दिनों से बैंगन का भर्ता और भात खाने का कर रह था | पर बने कैसे ? सबका मन करे तब न बने | परेशान बहू ने एक दिन एक बैंगन चूल्हे में डाल कर भून लिया | किसी को पता भी न चला | एक अलग हंडी में उसने भात निकल कर रख लिया | अब बैंगन का भर्ता लहसुन मिर्च डाल कर खूब स्वादिष्ट मनालायक बना कर भात की हांडी में छुपा कर रख दिया | पर अब भला वो खाए कहाँ ? उसने सोंचा पूजा घर में कोई नहीं जाता है इस समय वहीं जा कर खा लेती हूँ | पूजा घर में बैठ कर बड़ी तृप्ति से वह खायी अपना भर्ता भात | खाने के बाद उसकी निगाह भगवान की मूर्ति पर पड़ी | उसने देखा भगवान ने आश्चर्य से अपने दांतों तले उंगली दबा ली है | उसने पूजा घर जूठा कर दिया था | छोटी बहू को बड़ा गुस्सा आया | ....मुझे खाने का मन था | मुझे कहीं जगह न मिली तुम्हारे घर आयी तो तुमको भी बुरा लग गया | गुस्से में उसने अपनी हंडी भगवान के मुंह पर दे मारी | भगवान के दांत से उनकी उंगली निकल गयी | अब बहू ने चैन की साँस ली |

बुद्धू

    एक घर में एक दस साल का लड़का और उसकी माँ रहते थे | गाँव वाले उसे बुद्धू के नाम से पुकारते थे | एक दिन उसकी माँ को बुखार आया | माँ का बदन गर्म देख कर वह डर गया | उसे समझ नहीं आया कि अब वह क्या करे | फिर एकाएक उसे याद आया कि जब उसकी टांगी धूप में पड़ी पड़ी गर्म हो गयी थी तब उसने टांगी को रस्सी से बांध कर कूएं में डुबा दिया था | कूंए से निकलने पर टांगी की गर्माहट खत्म हो गयी थी | बस उसने माँ के कमर  में मजबूती से रस्सी बांधी और उसे कूंए में डाल दिया | कुछ देर तक वह माँ को डुबाये रखा और फिर उसे  बाहर निकल दिया | अब वह यह देख कर वह  हैरान हो गया कि उसकी माँ की गर्दन लटक गयी है |  वह बैठकर जोर जोर से रोने लगा |   उसकी माँ मर चुकी थी |

पुस्तकीय ज्ञान

एक गाँव में चार मित्र रहते थे | तीन मित्र विद्या ग्रहण करने गुरुकुल में चले गये | चौथा मित्र गाँव में ही रह गया | कुछ वर्ष पश्चात् वे विद्या अध्ययन कर गाँव लौटे | चरों मित्र खूब घूमे कुछ दिन साथ रहे | एक दिन उन्होंने सोंचा कि हमे अपनी विद्या का उपयोग कर धन कमाने शहर जाना चाहिए | चौथा मित्र कहने लगा कि वह भी उनके साथ जाएगा | पर तीनो मित्र मना करने लगे | उनका कहना था कि चूंकि वे विद्या ग्रहण किये हैं तो वे कमाएंगे अब चौथा मित्र जो अनपढ़ है वह कैसे उनके साथ जा सकता है | चौथा मित्र दुखी हो गया | अपने मित्र को दुखी देख तीनों मित्रों ने उसे भी साथ ले लिया | गमछे में चना और गुड़ बांध कर वे चले | कुछ दूर चलने के बाद  रास्ते में एक जंगल पड़ा | चारों मित्र एक पेड़ के नीचे आराम करने लगे | एक एक उनकी निगाह अस्थि समूह पर पड़ी |  " अरे ! ये तो बाघ की हड्डियाँ लगती हैं | " चौथे मित्र ने कहा  " मुझे हड्डियां जोड़नी आती हैं | " पहले मित्र ने ज्ञान बघारा | और उसने हड्डियाँ जोड़ दीं | " मुझे हड्डियों पर मांस पेशी चढ़ाना आता है | " दुसरे मित्र ने भी अपने ज्ञान का परिचय दिया | और उसने...

पंडित और चोर

रात का समय था | दो चोर रात में चोरी करने निकले थे | रास्ते में उन्हें एक पुजारी मिला | पुजारी ने पूछा---- तुमलोग कहाँ जा रहे हो ? पहले चोर ने कहा --- हमलोग चोरी करने जा रहे हैं | पुजारी कुछ न बोला | थोड़ी देर बाद दूसरा चोर पहले चोर के कान में फुसफुसाया ---- यह सबको बता देगा ! पहला चोर प्रत्युत्तर में फुसफुसाया --- ऐसा करते हैं इसे भी साथ ले लेते हैं | पंडित को दोनों चोरों ने धमकाया --- तू भी चल हमारे साथ चोरी करने नहीं तो हम तुझे मारेंगे | मरता  क्या न करता अब पंडित भी चला साथ में चोरी करने | एक धनी व्यक्ति के घर वे घुसे | दोनों चोरों ने बहुमूल्य वस्तुओं का जल्दी जल्दी दो गट्ठर बना लिया | इधर पंडित भी घर में घूम रहा था | एक जगह उसे सुन्दर सा शिव- पार्वती  का मंदिर दिखा | वह खुश हो कर वहीं बैठ गया और पूजा करने लगा | पूजा खतम होने पर उसने घंटी बजायी | चोर !...चोर !..---- चिल्लाते हुए घर का मालिक उठ गया | घर में अफरा तफरी मच गयी | चोरों की खूब पिटाई हुई |

बाल प्रार्थना

एक जंगल में एक पेड़ पर एक चिड़िया अपने घोंसले में अपने चूजों के साथ रहती थी |  एक बार जंगल में आग लग गयी |  " आग ! आग !..." चिल्लाते हुए सब जानवर भागने लगे | चिड़िया डर कर अपने घोसले में बैठी रही | उसके बच्चे उड़ नहीं सकते थे | " माँ तुम अपनी जान बचाओ |...तुम जिन्दा रहोगी तो तुम्हें और बच्चे मिल जायेंगे |  हम अपनी सुरक्षा खुद कर लेंगे | "  चूजों ने माँ से कहा | माँ की ऑंखें भर आयीं | दुखी मन से वह उड़ गयी | आग पूरे जंगल को जलाते जलाते चूजों के घोंसले तक पहुँची तब दोनों ने आग से प्रार्थना की ... " हे आग ! हम छोटे बच्चे हैं | इस घोंसले में अकेले हैं | हम उड़ नहीं सकते | ....कृपया आप हमें न जलाइए | " उन्हें देख आग को दया आ गयी | उसने उस पेड़ को छोड़ दिया | पूरा जंगल जल चूका था पर वह एक पेड़ हर भरा था | कुछ दिन बाद चिड़िया वापस लौटी तो अपने घोंसले में अपने बच्चों को सही सलामत पा फूली न समायी |

मित्रता की शक्ति

गुलगुला , चिड़िया और चूहा मित्र थे | वे एक साथ रहते थे | चूहा दाना लता था , चिड़िया तिनका और पानी लाती थी और गुलगुला खाना पकाता था |  गुलगुला आग जला कर हंडी में दाना पानी डाल देता था | खाना पक जाने पर खुद कूद जाता था हंडी में कुछ देर अंदर रहता था फिर बाहर निकल जाता था | इस प्रकार खाना स्वादिष्ट बन जाता था | एक बार अपने काम को ले कर तीनो लड़ पड़े | तीनों को अपना काम अधिक लग रहा था | आखिर तीनों ने अपना काम बदल लिया | गुलगुला तिनका और पानी लेने चला | चिड़िया दाना लाने उड़ी | चूहे का काम  अब खाना बनाना था | शाम हो गयी सामान जुटते जुटते |  गुलगुला लौटा तो क्त फट गया था उसका शरीर | चिड़िया थकी हारी थोड़ा सा दाना जुटा पाई थी | अब चूहे की बारी थी खाना बनाने की |  आग जलाने में और खाना पकाने में उसकी दुम और मूछें झुलस गयीं |  तीनों मित्र दुखी हुए | फिर वे निर्णय किये कि अब वे नहीं लड़ेंगें और अपना अपना पुराने काम में ही लगे रहेंगे |

व्यापार में भी ईमानदारी

विक्रम संवत 1740 की कथा है | एकबार गुजरात और सौराष्ट्र में अकाल पड़ा | खेत सूख गये | पशु - पक्षी सूखे के कारण मरने लगे | कितने यज्ञ व धार्मिक अनुष्ठान किये गये पर बर्षा न हुयी | किसी ने राजा से कहा  कि  अमुक व्यापारी चाहे तो वर्षा करवा सकता है | राजा उस व्यापारी के पास पहुंचे और उससे वर्षा करवाने की प्रार्थना करने लगे | अब व्यापारी बड़ा परेशान हुआ |  " हे राजन ! मैं एक आम आदमी हूं | मैं कैसे बरसा करवा सकता हूं | " उस व्यापारी ने राजा को समझाया  " क्या तुम्हें मूक पशुओं पर दया नहीं आती ? खेत सूख गये हैं | मुझे विश्वास है तुम प्रार्थना करोगे तो वर्षा जरूर होगी | " राजा ने व्यापारी से विनम्रता पूर्वक कहा | परेशान व्यापारी घर से अपनी तराजू ले आया और खुले आकाश के नीचे खड़े हो कर प्रार्थना करने लगा | " देवगण और लोकपाल साक्षी हैं , यदि इस तराजू से मैंने किसी को ठगा नहीं है , यदि इस तराजू से मैंने सदा ही सत्य और धर्म से वस्तुओं को तौला है तो हे देवराज इंद्र ! आप शीघ्र वर्षा कीजिये | " व्यवसायी के मुंह से यह वाक्य निकलते ही आकाश मेघाछ्न्न हो गया | मेघों का गर्जन सुनाई...

एकता का बल

एक समय की बात हैं कि कबूतरों का एक दल आसमान में भोजन की तलाश में उडता हुआ जा रहा था। गलती से वह दल भटककर ऐसे प्रदेश के ऊपर से गुजरा, जहां भयंकर अकाल पडा था। कबूतरों का सरदार चिंतित था। कबूतरों के शरीर की शक्ति समाप्त होती जा रही थी। शीघ्र ही कुछ दाना मिलना जरुरी था। दल का युवा कबूतर सबसे नीचे उड रहा था। भोजन नजर आने पर उसे ही बाकी दल को सुचित करना था। बहुत समय उडने के बाद कहीं वह सूखाग्रस्त क्षेत्र से बाहर आया। नीचे हरियाली नजर आने लगी तो भोजन मिलने की उम्मीद बनी। युवा कबूतर और नीचे उडान भरने लगा। तभी उसे नीचे खेत में बहुत सारा अन्न बिखरा नजर आया “चाचा, नीचे एक खेत में बहुत सारा दाना बिखरा पडा हैं। हम सबका पेट भर जाएगा।’ सरदार ने सूचना पाते ही कबूतरों को नीचे उतरकर खेत में बिखरा दाना चुनने का आदेश दिया। सारा दल नीचे उतरा और दाना चुनने लगा। वास्तव में वह दाना पक्षी पकडने वाले एक बहलिए ने बिखेर रखा था। ऊपर पेड पर तना था उसका जाल। जैसे ही कबूतर दल दाना चुगने लगा, जाल उन पर आ गिरा। सारे कबूतर फंस गए। कबूतरों के सरदार ने माथा पीटा “ओह! यह तो हमें फंसाने के लिए फैलाया गया जाल था। भूख ने मेरी...

एक और एक ग्यारह

एक बार की बात हैं कि बनगिरी के घने जंगल में एक उन्मुत्त हाथी ने भारी उत्पात मचा रखा था। वह अपनी ताकत के नशे में चूर होने के कारण किसी को कुछ नेहीं समझता था। बनगिरी में ही एक पेड पर एक चिडिया व चिडे का छोटा-सा सुखी संसार था। चिडिया अंडो पर बैठी नन्हें-नन्हें प्यारे बच्चों के निकलने के सुनहरे सपने देखती रहती। एक दिन क्रूर हाथी गरजता, चिंघाडता पेडों को तोडता-मरोडता उसी ओर आया। देखते ही देखते उसने चिडिया के घोंसले वाला पेड भी तोड डाला। घोंसला नीचे आ गिरा। अंडे टूट गए और ऊपर से हाथी का पैर उस पर पडा। चिडिया और चिडा चीखने चिल्लाने के सिवा और कुछ न कर सके। हाथी के जाने के बाद चिडिया छाती पीट-पीटकर रोने लगी। तभी वहां कठफोठवी आई। वह चिडिया की अच्छी मित्र थी। कठफोडवी ने उनके रोने का कारण पूछा तो चिडिया ने अपनी सारी कहानी कह डाली। कठफोडवी बोली “इस प्रकार गम में डूबे रहने से कुछ नहीं होगा। उस हाथी को सबक सिखाने के लिए हमे कुछ करना होगा।” चिडिया ने निराशा दिखाई “हमें छोटे-मोटे जीव उस बलशाली हाथी से कैसे टक्कर ले सकते हैं?” कठफोडवी ने समझाया “एक और एक मिलकर ग्यारह बनते हैं। हम अपनी शक्तियां जोडेंगे।...

छेदवाली बाल्टी

किसी गाँव में एक किसान को बहुत दूर से पीने के लिए पानी भरकर लाना पड़ता था. उसके पास दो बाल्टियाँ थीं जिन्हें वह एक डंडे के दोनों सिरों पर बांधकर उनमें तालाब से पानी भरकर लाता था. उन दोनों बाल्टियों में से एक के तले में एक छोटा सा छेद था जबकि दूसरी बाल्टी बहुत अच्छी हालत में थी. तालाब से घर तक के रास्ते में छेद वाली बाल्टी से पानी रिसता रहता था और घर पहुँचते-पहुँचते उसमें आधा पानी ही बचता था. बहुत लम्बे अरसे तक ऐसा रोज़ होता रहा और किसान सिर्फ डेढ़ बाल्टी पानी लेकर ही घर आता रहा. अच्छी बाल्टी को रोज़-रोज़ यह देखकर अपने पर घमंड हो गया. वह छेदवाली बाल्टी से कहती थी की वह आदर्श बाल्टी है और उसमें से ज़रा सा भी पानी नहीं रिसता. छेदवाली बाल्टी को यह सुनकर बहुत दुःख होता था और उसे अपनी कमी पर लज्जा आती थी. छेदवाली बाल्टी अपने जीवन से पूरी तरह निराश हो चुकी थी. एक दिन रास्ते में उसने किसान से कहा – “मैं अच्छी बाल्टी नहीं हूँ. मेरे तले में छोटे से छेद के कारण पानी रिसता रहता है और तुम्हारे घर तक पहुँचते-पहुँचते मैं आधी खाली हो जाती हूँ.” किसान ने छेदवाली बाल्टी से कहा – “क्या तुम देखती हो कि पग...

राजा का दान

एक संन्यासी एक राजा के पास पहुंचे। राजा ने उनका खूब आदर-सत्कार किया। संन्यासी कुछ दिन वहीं रुक गए। राजा ने उनसे कई विषयों पर चर्चा की और अपनी जिज्ञासा सामने रखी। संन्यासी ने विस्तार से उनका उत्तर दिया। जाते समय संन्यासी ने राजा से अपने लिए उपहार मांगा। राजा ने एक पल सोचा और कहा, जो कुछभी खजाने में है, आप ले सकते हैं।’संन्यासी ने उत्तर दिया, ‘लेकिन खजाना तुम्हारी संपत्ति नहीं है,वह तो राज्य का है और तुम मात्र उसके संरक्षक हो। राजा बोले, ‘तो यह महल ले लीजिए।’ इस पर संन्यासी ने कहा ‘यह भी तो प्रजा का है।’ इस पर राजा ने कहा, ‘तो मेरा यह शरीर ले लीजिए।’ संन्यासी ने उत्तर दिया, शरीर तो तुम्हारी संतान का है। मैं इसे कैसे ले सकता हूं? राजा ने हथियार डालते हुए कहा, तो महाराज आप ही बताएं कि ऐसा क्या है जो मेरा हो और आपको देने लायक हो? संन्यासी ने उत्तर दिया, ‘हे राजा, यदि तुम सच में मुझे कुछ देना चाहते हो, तो अपना अहंकार देदो। अहंकार पराजय का द्वार है। यह यश का नाश करता है। यह खोखलेपन का परिचायक है। अहंकार का फल क्रोध है। अहंकार वह पाप है जिसमें व्यक्ति अपने को दूसरों से श्रेष्ठ समझता है। वह जिस...

आलसी भालू और मेहनती भालू

दो भालू थे |  एक आलसी भालू था और एक मेहनती भालू था | मेहनती भालू दिन भर घूमता था और शहद इकठ्ठा करता रहता था | वह शहद खाता था और भविष्य के लिए अपने कमरे के ड्रम में डाल देता था |  आलसी भालू दिन भर धूप सेंकता रहता था | अपने घर के सामने लेटा रहता था | आलसी भालू ने अपने कमरे से मेहनती भालू के कमरे तक जमीन के अंदर अंदर एक सुरंग खोद दी थी |उस सुरंग से उसने एक पतली पाईप का एक छोर शहद वाले ड्रम में डाल दी थी और दूसरी छोर अपने कमरे में रक्खी थी | जब मेहनती भालू घर से बाहर जाता था तब आलसी भालू मेहनती भालू के ड्रम से शहद मुंह से पाईप की सहायता से सोख कर पी जाता था | एक दिन मेहनती भालू जब अपने ड्रम को देखने गया  | वह सोंचा था कि काफी शहद इकठ्ठा हो गया होगा पर उसका ड्रम दस प्रतिशत ही भरा था शहद से | आलसी भालू बहुत दुखी हुआ | उसने अपनी समस्या अपनी मित्र लोमड़ी को बताई | लोमड़ी मेहनती भालू के घर पहुंची | उसने उसके घर का मुआयना किया | बाहर सोये आलसी भालू को देख उसकी भौं चढ़ गयी  | लोमड़ी ने मेहनती भालू से निश्चिन्त हो जंगल जाने को कहा | वह खुद  भालू के घर में अकेली रह गयी |  ल...

पनडब्बा

एक औरत थी | वह खूब पान खाती थी | उसके पास एक ख़ूबसूरत पनडब्बा था | वह चाहती थी लोग उसके पनडब्बा के बारे में जानें | उस पनडब्बा को लोग देखें | पर कैसे दिखाए वो सबको | लोगों को जबरदस्ती तो दिखा नहीं सकती थी | एकाएक उस औरत के दिमाग में एक उपाय आया | उसने अपने घर में आग लगा दी |  घर जलते देख कर अगल बगलवाले दौड़े | कोई आग बुझा रहा था तो कोई सामान निकल रहा था | वह औरत चिल्लाई ...अरे मेरा पनडब्बा निकालो ! कुछ लोग पूछे ...अरे आप पान खाती हैं ? वह औरत बोल पड़ी ....आगे पूछे होते तो क्या मैं अपने घर में आग लगाती |

कुत्ता और कांच का घर

एक कुत्ता था |  वह एक दिन एक कांच के घर में भूल  से घुस गया | जिस तरफ वह देखे उसे एक कुत्ता दिखाई दे | गुस्सा से वह उस पर भूँकने लगा | भूंकते भूंकते  वह थक गया और हार कर बैठ गया |  कुत्ते ने देखा कि सामनेवाला कुत्ता भी बैठ गया है | थोड़ी देर बाद वह कुत्ता उठ खड़ा हुआ और कांच में के कुत्ते को देख अपनी दुम हिलाने लगा | अब दूसरा कुत्ता  भी दुम् हिला रहा था | कुत्ते को बड़ा मजा आया | वह जोर जोर से कूद कर कांच में के कुत्ते को छूने लगा | उसने देखा कांच के अंदर वाला  कुत्ता भी उसे छू रहा है | इस प्रकार वह देर तक खेलता रहा कुत्ता | फिर वह कांच के घर से बाहर निकल आया |  अब वह हर रोज जाता था उस कांच के घर में क्योंकि उसे वहां मजा आने लगा था |

गधे की कामना

  एक गधे के दो बच्चे थे |  जब वे गधे के बच्चे थोड़ा बड़े हुए तो गधे के मालिक ने उन्हें बेच दिया | मालिक ने एक बच्चे को धोबी के घर बेचा और दुसरे को सर्कस में | इस प्रकार वे दोनों भाई एक दुसरे से बिछड़ गये | दस वर्ष बाद वे दोनों गधे के बच्चे फिर एक दुसरे से मिले | अब वे दोनों बड़े हो चुके थे | " अरे ! तुम कितने दुबले हो गये हो ? " सर्कसवाला गधा अपने भाई को देख दुखी मन से कह उठा | " पर तुम कितने मोटे ताजे हो | " धोबी के घरवाला गधा कह उठा | " हां .. जहाँ मैं रहता हूँ वहां बहुत से जानवर रहते हैं | सबको भरपेट खाना मिलता है | हमारे यहां डाक्टर भी आता है | हम बीमार होते हैं तो हमें दवा भी देता है | .... पर हमें यहां वहां बहुत भटकना पड़ता है .. देखो मेरे  खुर कितने घिस गये हैं पर तुम्हारे खुर कितने चमकीले हैं | " " हां .. सचमुच तुम्हारे खुर घिस गये हैं ... ऐसा करो तुम सर्कस छोड़ कर मेरे पास आ जाओ ...हमलोग साथसाथ रहेंगे | " " हां ... तुम्हारी बात सही है ...मैं कुछ दिन बाद तुम्हारे पास आ जाऊँगा .... असल में न हमारे सर्कस में एक सुन्दरी है ... वह हवा में उड़ती...

टके सेर भाजी टेक सेर खाजा

एक साधू अपने दो शिष्यों के साथ भ्रमण के लिए निकला | घूमते घूमते वह एक ऐसे राज्य में पहुंचा जहां सब वस्तु का मूल्य एक टका था |  दोनों शिष्य बाजार से लौट कर प्रसन्नचित हो यह बात गुरु को बताये और बोले कि अब हम यहीं बसेंगे | साधू ने कहा अब हम यहां एक पल भी नहीं रहेंगें | जहां सभी वस्तु का एक मोल होता है वह जगह रहने लायक नहीं होती | पर एक शिष्य जिद कर के रह गया और साधू अपने एक शिष्य को साथ ले आगे बढ़ गया | खूब आनन्द से इस राज्य में खा पी के शिष्य रहने लगा | कुछ महीनों में यह शिष्य मोटा तजा हो गया | एक बार राज्य में चोरी हो गयी और चर पकड़ा गया | चोर के लिए फांसी की सजा नियत हुयी | नियत समय पर चोर को जब फांसी के फंदे के पास लाया तो पता चला कि फंदा बड़ा है | अब राजा  ने आज्ञा दी कि शहर में ढूंढ कर सबसे मोटे ताजे व्यक्ति को लाया जाय और उसे फंदे में लटका दिया जाय | पूरे राज्य में यह खबर आग की तरह फ़ैल गयी | साधू तक भी यह बात पहुंची | साधू अपने शिष्य के साथ अपने पुराने शिष्य का हालचाल  लेने इस राज्य में लौटा | इधर खा  पी के मोटा हुए शिष्य को राजा के सिपाहियों ने पकड़ कर जेल में डाल ...

झोपडी की कीमत

जाड़े की भोर थी |  रानी अपनी सहेलियों के साथ नदी में नहाने गयी | नहाने के बाद उसे  ठंड लगने लगी | सामने एक खाली फूस की झोपड़ी देख वह सोंची क्यों न इसे जला कर आग तापा जाय | बस रानी के मन की बात सुनते ही सहेलियों ने आग लगा दी झोपड़ी में | रानी अपनी सहेलियों के साथ जम कर आग तापीं फिर अपने महल लौट गयीं | गरीब आदमी जब झोपड़ी में लौटा तो पाया कि उसकी झोपड़ी राख बन चुकी है |   दुखी मन से वह गरीब आदमी राजा  के दरबार में  रानी की शिकायत ले कर पहुंचा |  राजा ने रानी को दरबार में बुलवाया  और पूछा कि क्या उसने  आज एक झोपड़ी जलायी है | " हाँ जलाई तो थी | वो खाली पड़ी थी | ... " रानी ने कहा | " तो अब वो गरीब बेचारा कहां रहेगा ? "  ने प्रश्न किया | " ठीक है ...मैं बनवा दूंगी झोपड़ी | "  " तुम कैसे बनवा दोगी ?....तुमको झोपड़ी खुद कमा कर बनवाना पड़ेगा |...एक झोपड़ी इतनी आसानी से नहीं बनती .... तुमको आज से ही राजमहल से मैं निष्कासित करता हूँ ....अब जब तुम झोपड़ी बनवा लोगी तभी मेरे महल में प्रवेश कर पाओगी | " यह कह कर राजा ने रानी को राजमहल से निकाल दिया | अब रानी काम...

सरल मेमना

दो भेड़िये आपस में लड़ रहे थे |  कूदते फांदते सड़क से गुजरते हुए मेमने की निगाह लड़ते भेड़ियों पर पड़ी |  मेमना कुछ पल तक वहीं खड़ा रहा | फिर उसे याद आयी गुरूजी की बात .. लड़ना नहीं चहिये .....हमें आपस में मिल कर रहना चाहिए .... मेमना चिल्लाने लगा ..... अरे ! क्यों लड़ते हो ........लड़ो मत ....अरे ! लड़ो मत .... भेड़ियों की लड़ाई पल भर में रुक गयी |  उनकी निगाह मेमने  पर पड़ी | दोनों की निगाहें आपस में मिलीं | आंखें चमकीं | वे दोनों एक साथ मेमने पर टूट पड़े |

समझदार बकरियां

दो बकरियां थीं | वे दोनों नदी के विपरीत किनारों से पुल पर चढीं थीं | चलते चलते जब वे एक दुसरे के सामने आयीं तब उन्हें लगा कि पुल तो संकरा है | दोनों बकरियों ने कुछ देर सोंचा ...फिर एक बकरी बैठ गयी पुल पर और दूसरी  बकरी उसके पीठ पर पैर रख पार हो गयी |

गोलू , मोलू और भालू

गोलू-मोलू और पक्के दोस्त थे। गोलू जहां दुबला-पतला था, वहीं मोलू मोटा गोल-मटोल। दोनों एक-दूसरे पर जान देने का दम भरते थे, लेकिन उनकी जोड़ी देखकर लोगों की हंसी छूट जाती। एक बार उन्हें किसी दूसरे गांव में रहने वाले मित्र का निमंत्रण मिला। उसने उन्हें अपनी बहन के विवाह के अवसर पर बुलाया था। उनके मित्र का गांव कोई बहुत दूर तो नहीं था लेकिन वहां तक पहुंचने के लिए जंगल से होकर गुजरना पड़ता था। और उस जंगल में जंगली जानवरों की भरमार थी। दोनों चल दिए…जब वे जंगल से होकर गुजर रहे थे तो उन्हें सामने से एक भालू आता दिखा। उसे देखकर दोनों भय से थर-थर कांपने लगे। तभी दुबला-पतला गोलू तेजी से दौड़कर एक पेड़ पर जा चढ़ा, लेकिन मोटा होने के कारण मोलू उतना तेज नहीं दौड़ सकता था। उधर भालू भी निकट आ चुका था, फिर भी मोलू ने साहस नहीं खोया। उसने सुन रखा था कि भालू मृत शरीर को नहीं खाते। वह तुरंत जमीन पर लेट गये और सांस रोक ली। ऐसा अभिनय किया कि मानो शरीर में प्राण हैं ही नहीं। भालू घुरघुराता हुआ मोलू के पास आया, उसके चेहरे व शरीर को सूंघा और उसे मृत समझकर आगे बढ़ गया। जब भालू काफी दूर निकल गया तो गोलू पेड़ से उत...

साधू और सांप

26 July 2014 22:19 एक  बार एक साधू के पास एक  सांप पहुंचा और उन्हें नमस्कार किया | साधू ने सांप को समझाया कि उसे मनुष्य को काटना छोड़ देना चाहिए | सांप ने साधू की बात मान ली |  अब सांप शांत हो खाली रेंग कर आता जाता था और गाँव के बह्चे उसे देखते ही पत्थर मरते थे | एक दिन साधू ने यह दृश्य देखा | वह बड़ा दुखी हुआ | उसने सांप को समझाया कि वह फुंफकार कर लोगों को डरा तो सकता ही है | लोग डर कर उससे दूर भाग जायेंगे | लोग उससे डरेंगे नहीं तो मारेंगे ही पत्थर |  सांप ने साधू की बात मान ली |  तब से सांप हमें फुफकार कर डराता है और हम उससे डर कर दूर भाग जाते हैं |

राजा और नन्ही चिड़िया

08 August 2014 10:03 एक बार एक राजा अपने बाग़ में टहल  रहा था | एक घने पेड़ के नीचे से जब वह गुजर रहा था तब उसे एक चिड़िया का गीत सुनाई दिया - ' मैं सबसे धनी ...मैं सबसे धनी .... ' राजा आश्चर्यचकित हुआ | उसने अपने सहायक से पता लगाने को कहा कि आखिर यह चिड़िया क्यों ऐसे गा रही है | राजा का सहायक पेड़ पर चढ़ा |  पेड़ पर से उतर कर उसने कहा कि राजन ! उस चिड़िया के घोंसले में एक सोने का सिक्का है | इसीलिये वह चिड़िया गा रही है खुशी में | राजा ने सहायक को आदेश दिया कि वह जा कर उसके घोंसले से वह सोने का सिक्का निकाल ले |  सहायक पेड़ पर चढ़ के चिड़िया के घोंसले से  सोने का सिक्का निकाल लाया और राजा को दे दिया |  ज्यों ही कुछ कदम आगे चला राजा चिड़िया गाने लगी - ' राजा ने लूट लिया ...राजा ने लूट लिया ..... ' राजा गुस्सा हो गया | उसने सैनिकों को आदेश दिया कि वे उस दुष्ट चिड़िया को पकड़ लें | चिड़िया को पकड़ सिपाही दरबार में लाये | सैनिक ज्यों ही चिड़िया को राजा को पकड़ाये  राजा के हाथ से फड़फड़ा कर निकल गयी वह चिड़िया और दरबार के झरोखे पे बैठ के गाने लगी - ' राजा ने लूट लिया ....... राजा ने...

ऊपरवाला देख रहा है

13 August 2014 09:45 एक अंधा भिखारी था |  एक दिन जब  वह सड़क के बगल से अपने हाथ में अल्युमिनियम का बड़ा सा कटोरा लिये गुजर रहा था तब एक घर की मालकिन ने उसे बुला कर भात दाल खाने को दिया | भिखारी खाना खाने के बाद जब गेट के पास से उठाना चाहा तब उठ न पाया | " अरे ! .... कोई मुझे उठा दो जमीन से | ....... भगवान के नाम पे तुम मुझे उठा दो जमीन से ....... मुझे सड़क पार करा दो भगवान के नाम पे .....| " चिल्लाने लगा भिखारी | किसी ने उसकी बात पे ध्यान न दिया |  इसी समय बगल से एक अठारह वर्षीय छात्र अपने सहपाठियों के साथ स्कूल के युनिफोर्म में गुजरा | एक भिखारी को चिल्लाते देख देख वह मित्रों से अलग हो गया और उस भिखारी को हाथ पकड़ कर उठाया और उसे रास्ता पार करा दिया | उस छात्र के मित्र रुके रहे उसके लिये ,और जब वह लौटा तब सब एक साथ अपनी स्कूल बस पकड़ने के लिये चल पड़े | इधर अंधे भिखारी के मुंह से आशीर्वचनों की बरसात हो रही थी ....... " भगवान तेरा भला करे ...... तू बड़ा आदमी बने .... तेरा घर धन दौलत से भरे ...... तेरा दिल हर दुखी के लिये तडपे ....... " घर के सामने सड़क के किनारेवाले  दुकानद...

भय ही भूत

27 August 2014 13:02 एक दिन गांव  में हल्ला मचा | सब भागने लगे एक दुसरे सुन के कि गांव  में एक राक्षस आनेवाला है | वह राक्षस आदमी को मार कर खा जाता है | एक पांच वर्षीय बालक ने सोंचा कि देखा जाय यह राक्षस कैसा है | सभी गांववाले गांव छोड़ कर भाग गये |  दूसरे दिन बालक ने देखा कि गांव में एक विशालकाय राक्षस घूम रहा है | वह राक्षस अपने सामने एक पांच वर्षीय बालक को खड़े देख चौंक गया | ' ए लड़के ! सब गांववाले मुझसे डर के भाग गये | तू नहीं गया ? तुझे मुझसे डर नहीं लगता ? ' , राक्षस ने बालक से गुर्रा कर पूछा | ' नहीं , मुझे किसीसे नहीं डर लगता | मैं क्यों डरूं भला तुमसे ? ' बालक ने बहादुरी से जवाब दिया | एक छोटे से बालक के मुंह से इस प्रकार का निडर उत्तर पा राक्षस थोड़ा डर गया |  राक्षस का आकार थोड़ा घट गया | अब आश्चर्य से भरा राक्षस क्रोध में आ कर बार बार बालक से अपना पहला प्रश्न पूछने लगा | पांच वर्षीय बालक के हर निडरता भरे उत्तर सुन  राक्षस का आकार घटने लगा | और अंत में राक्षस बिंदु बन के गायब हो गया | बालक खुश हो गया | गांववाले जब वापस लौटे तो गांव में बालक को जिन्दा पा क...

कुंए का मेढ़क

13 November 2014 17:41 एक कूएं  में दो मेढ़कों का परिवार रहता था | दोनों रिश्तेदार थे और एक दूसरे से जलते थे | एक दिन एक मेढ़क को चतुराई सूझी | उसने सोंचा क्यों न मैं सांप से दोस्ती कर लूं और उसे अपने कूआं में बुला लूं तो वह मेरे कूएं  के रिश्तेदार परिवार को खा लेगा | फिर पूरे कूएं में मेरा परिवार आराम से रहेगा | बस फिर क्या था वह चतुर मेढ़क फुदक कर निकला कूएं  से बाहर और ले के आया एक सांप अपने कूआं में | धीरे धीरे उस सांप ने एक एक कर के सब मेढ़क निगल लिया  सरल मेढ़क के परिवार का | चतुर मेढ़क ने अब सांप को कुयें से बाहर जाने को कहा पर सांप राजी नहीं हुआ | सांप को आराम से भोजन करने की आदत हो चुकी थी |  अब मेढ़क एक एक कर कर हर रोज चतुर मेढ़क के परिवार के सदस्यों को खाने लगा |  चतुर मेढ़क का पुत्र और पत्नी भी खाए जा चुके थे | अब आनेवाले कल उसी चतुर मेढ़क  की बारी थी | चतुर मेढ़क ने समझाया सांप को कि वह उसे कुयें से बाहर जाने दे | वह जाकर अपने दुसरे रिश्तेदारों को लायेगा | सांप को चतुर मेढ़क की बात उचित लगी | वह  चतुर मेढ़क को कूएं से बाहर निकलने पर मना नहीं किया ...

जमीन का झगड़ा

18 November 2014 22:00 -इंदु बाला सिंह  एक गांव में दो भाई थे | अपने पैतृक घर की एक हाथ की जमीन के लिये हर रोज वे लड़ पड़ते थे आपस में | सारा गांव यह तमाशा देखता था | एक बार दोनों भाईयों में उसी एक हाथ की जमीन के लिये आपस में मार पीट हो गयी | फिर दोनों ने एक दुसरे को अदालत में देख लेने की धमकी दी |  गांववालों ने दोनों भाईयों को समझाया कि वे कोर्ट कचहरी के चक्कर में न पड़े गांव से दूर में एक पहाड़ी गुरूजी रहते हैं | उन दोनों भाईयों को उनके पास जाना चाहिये | वे जरूर उनकी समस्या सुलझा देंगे | दोनों भाईयों ने सोंचा कि वहीं जा कर एक बार अपनी समस्या का हल खोजा जाय | वैसे उन्होंने भी उस विद्वान् गुरु जी का नाम सुन रखा था | दुसरे दिन सुबह सुबह दोनों भाई निकल पड़े अपने अपने घर से | गुरूजी के घर पहुंचते पहुंचते दोनों भाई थक चुके थे | गुरूजी ने दोनों भाईयों से उनकी समस्या सूनी और अपनी पत्नी से एक थाली में दो आदमी का खाना परोस  के लाने को कहा |  गुरुपत्नी जब खाने की थाली और पानी का लोटा रख कर चली गयी तब गुरूजी उठे और दो डंडा ला कर थाली का बगल में रख दिये |  " तुम लोग जो चाहिये उ...

समझदार मेढ़क

30 November 2014 20:55 एक बार एक ग्वाला ने शाम को बाल्टी में दूध दूहा और अपनी दूध से भरी दोनों ही बाल्टी को खटाल में रख के भूल गया | दो मेढ़क कहीं से कूदते कूदते आये और उन बाल्टियों में गिर पड़े |  पहली  बाल्टी का मेढ़क डर गया | वह सोंचा अभी तो रात है और ग्वाला तो सुबह ही आयेगा | वह तो अब बच नहीं सकता | कुछ घंटों में वह मेढ़क मर गया | दूसरी बाल्टी का मेढ़क जब गिरा दूध में तो बड़ा परेशान हुआ | उसने सोंचा ग्वाला तो रात में आयेगा नहीं कि उसे दूध से बाहर निकल फेंकेगा | उसने सोंचा कि डरना क्या जब तक है जान तैरता रहुंगा | और रात भर वह मेढ़क अपनी पूरी ताकत लगाकर तैरता रहा | कुछ ही घंटों में दूध से मक्खन निकल आया | अब मेढ़क कूद कर उस मक्खन पर बैठ गया | फिर उसने एक जोरदार छलांग लगायी और वह दूध की बाल्टी के बाहर निकल आया |

भाग्य चले सदा पुरुषार्थी के साथ

07 January 2015 10:05 -इंदु बाला सिंह  धर्मराज और कर्मराज नामक दो राजा थे | दोनोंके राज्य की सीमायें पास थीं | दोनों राजा साधू संतों का आदर करते थे | आये दिन राजा अपने शक्ति का प्रदर्शन करने के लिये एक दुसरे पर चढ़ाई करते थे और  अपना कुछ इलाका गंवा बैठते थे |  एक बार युद्ध से पहले धर्मराज अपने राजय के महर्षि के पास आशीर्वाद के लिये गया | राजा के पास विशाल सेना थी इस समय |  महर्षि ने कहा - ' तुम्हारी विजय निश्चित है | ' धर्मराज खुशी खुशी अपने राज महल में लौट गये | उन्होंने अपने सेनापति को महर्षि का आशीर्वाद सुनाया | सेनापति से बात सैनिकों तक पहुंची | अब पूरी सेना खुश थी | उधर कर्मराज भी अपने राज्य के महर्षि  से मिला | महर्षि को ज्ञात था कि राजा की सेना कम है | अतः महर्षि ने कहा - ' तुम्हारी जीत संदिग्ध है | ' कर्मराज दुखी मन से वापस लौटा | उसने अपने सेनापति को महर्षि का कथन सुनाया | ' राजन ! आप निश्चिन्त रहें हम युद्ध में अपना जी जान लगा देंगे | आप देखिएगा | हमारा एक एक सैनिक उनके दस सैनिक के बराबर है |  हम जरूर जीतेंगे युद्ध में | ' सेनापति ने कहा | सेनापति ...

लुटेरे का मन परिवर्तन

11 January 2015 21:32 ऋतुराज नामक एक लूटेरा था | रात के अंधेरे में वह नदी के किनारे एक पत्थर पर बैठा रहता था और  जो कोई राहगीर  उधर से गुजरता था उसे वह लूट लेता था |  एक दिन ऋतुराज का दिल अपने बुरे कर्मों से ऊब गया | वह एक संत के पास गया | उसने संत से अपने मन की बात बतायी | संत ने ऋतुराज की दिनचर्या ध्यान से सूनी फिर उसने कहा कि वह पहले की ही तरह रात में प्रतिदिन नदी के किनारे पत्थर पर बैठे पर वह किसी को न लूटे | जिस दिन भगवान् उसे क्षमा कर देंगे उस दिन उसके गांव का घंटा खुद बज उठेगा | संत की बात सुन कर ऋतुराज हर रोज रात में नदी के किनारे पत्थर पर चुपचाप बैठा रहता था | धीरे धीरे गांव के लोग उससे डरना बंद कर दिये | इसीतरह चार महीने से ऊपर हो गये ऋतुराज को नदी के किनारे बैठते | अब वह परेशान रहने लगा | वह सोंचने लगा मन्दिर का घंटा आखिर कब बजेगा |  एक रात एक राहगीर को मार पीट कर उसका सामान छीनने लगे | ऋतुराज दौड़ कर उस लुटेरे को मार पीट कर  भगा दिया  फिर  दुखी मन से वह  मन्दिर की ओर चल पड़ा | इसी बीच उसे मन्दिर से घंटे की आवाज सुनायी पड़ी | वह खुश हो कर ...

आम का पेड़

15 April 2015 19:58 -इंदु बाला सिंह  प्रिया नाम की एक छोटी सी लड़की थी | उसके पिता नहीं थे | वह अपने नाना के घर रहती थी | उसके नाना का बड़ा सा मकान था शहर में और उस मकान के पीछे खाली जमीन थी |  प्रिया के नाना ने उस जमीन पर एक कलमी आम का पेड़ लगा दिया था | उस आम के नीचे बैठ कर प्रिया पढ़ती थी , खेलती थी , झूला झूलती थी | आम का पेड़ प्रिया के जीवन का अभिन्न अंग था , यों कहिये वह आम का पेड़ प्रिया का मित्र था | गर्मियों में वह पेड़  अपना खट्टा और मीठा फल खिलाता था | गर्मी की दोपहर में मुहल्ले के बच्चे मकान की चाहरदीवारी फांद कर आते थे और आम तोड़ कर ले जाते थे | चूंकि वह कलमी आम का पेड़ था तो वह छोटा था और फल भी नीचे ही लटके रहते थे | सभी छोटे बच्चे बड़े आराम से उस पेड़ का फल तोड़ कर ले जाते थे | एक गर्मी के इतवार को अपनी चटायी पर लेट कर प्रिया एक कहानी की किताब पढ़ रही थी तभी उसे लगा आम का पेड़ उससे कुछ बोल रहा है ..... ' प्रिया ! तुम चली जाओगी अपने घर और मैं बूढ़ा हो कर मर जाऊंगा लोग मुझे ले जा कर बेच देंगे बाजार में | मेरा बीज भी तो लोग कूड़े में डाल देते हैं | मेरी संतानें भी नहीं रहेंगी...

पैतृक अमरूद का पेड़

22 July 2015 23:20 -इंदु बाला सिंह  मुकुंद चंद नामक एक व्यापारी था | उसके तीन बेटे थे | एक बार वह बीमार पड़ा और मर गया | अब घर की जिम्मेवारी बेटों पर आ पड़ी |  वे कुछ काम तो करते नहीं थे पिता के रखे पैसों से घर घर चला ,पर कब रखा पैसा चलता  पिता का रखा पैसा भी खत्म हो गया | घर में दो अमरुद के पेड़ थे | ये बारहमासी पेड़ थे | इनमें साल भर अमरुद फलता था | एक भाई अमरुद तोड़ता था | दूसरा भाई  अमरुद को टोकरी में  भर कर शहर के बाजार में बेच आता था | तीसरा भाई उन पैसों से घर का सामान लाता था |  घर में दरिद्रता फ़ैली थी | कोई भाई शहर में जा कर काम ढूंढना न चाहता था | बस किसी तरह घर में रुखा सूखा खा कर जी रहे घर के प्राणी | एक बार मुकुंद चंद के मित्र राधेश्याम आये अपने गुजरे हुये मित्र के घर | घर का हाल देख वे बहुत  दुखित हुये |  वे सोंचे कि घर में जब तक अमरुद का पेड़ है तब तक ये लड़के कोई काम न करेंगे |  अमरुद न मिलने पर ये तीनों भाई जरूर कुछ न कुछ काम ढूंढेगे | उसी रात उस मेहमान ने दोनों अमरुद का पेड़ काट दिया | सुबह अपने कते अमरुद का पेड़ देख के तीनों भाई बड़े ...

मां की चुप्पी

सिद्धेश नाम का एक लड़का था | वह आये दिन स्कूल में अपने सहपाठियों के पेन , रबर ,पेंसिल चुराता था | स्कूल के शिक्षक सिद्धेश को सजा दे के परेशान थे |   घर में सिद्धेश की माँ से शिकायत कर कर के थक चुके थे | सिद्धेश की माँ घरों में काम करती थी | चीनी , चायपत्ती , साबुन की छोटी बट्टी मालिक के घर से चुरा कर अपने घर लाना उसकी आदत थी | कभी कभी तो वह घरों में जमीन पर गिरे सिक्के भी चूरा लेती थी | उसे सिद्धार्थ का पेन , पेन्सिल इत्यादि चुराना आम बात लगती थी | सिद्धेश के पिता सुबह सुबह शहर में मजूरी करने जाते थे तो शाम को लौटते थे | पढ़ाई में कमजोर सिद्धेश घर के अभाव के कारण धीरे धीरे कुछ वर्षों में एक बड़ा चोर बन गया | वह बसों में पाकेटमारी करने लगा | आखिर एक बार सिद्धार्थ पुलिस की पकड़ में आ गया | उसे कोर्ट में जज ने एक साल की सजा सुनायी | सिद्धार्थ ने जज से अपनी माँ से एक मिनट बात करने की आज्ञा मांगी | माँ को अपने पुत्र सिद्धेश से एक मिनट के लिये मिलने की सहमति मिल गयी |  माँ पुत्र से मिलने कटघरे के पास खड़ी हुयी | सिद्धेश ने माँ के कान में कुछ फुसफुसा कर कहने की चेष्टा की और फट से उसका कान...

स्वर्ग में स्थान

' भगवन ! आप उस किसान के लिये अभी से स्वर्ग में स्थान आरक्षित कर लिये हैं पर अपने पुजारी के लिये नहीं | ' एक दिन एक भक्त भगवान से बोला | भगवान मौन रहे | ' यह तेल का पात्र अपने हाथ में पकड़ कर सारी दुनिया की परिक्रमा करो लेकिन ख्याल रखना एक भी तेल की बूंद धरती पर न गिरे | ' -भगवान ने एक तेल से भरा  पात्र अपने भक्त को पकड़ाते हुये कहा | भक्त दुनिया की परिक्रमा कर के लौट आया और तेल का पात्र वापस भगवान को पकड़ा दिया | ' भक्त ! तुमने कितनी बार मेरा स्मरण किया ? '  ' भगवन ! मेरा ध्यान तो तेल के पात्र में था | हमेशा सोंचता रहा कहीं तेल छलक के नीचे न गिर जाय | मैं सदा इसी चेष्टा में लगा रहा | ' - भक्त ने उत्तर दिया | ' वह किसान भी जब हर रोज अपना हल बैल ले के जब अपने घर से निकलता है तब मुझे गुहार लगाता है ....हे ईश्वर ! मेरी फसल अच्छी हो ....और फिर वह दिन भर अपने खेतों में मन लगा कर काम करता है | शाम को अपने वह अपने परिवार के सुख दुःख का ख्याल रखता है | ' भक्त को अपने प्रश्न का उत्तर मिल गया था |

दुष्टता की सजा

एक बार सियार और भालू किसी बात पर लड़ पड़े | पल भर दोनों एक दुसरे के दुश्मन बन गये थे , तभी उनकी सामने से गुजरते कछुये पर पड़ी | दोनों की आंखें चमक गयीं | सियार गांव से एक झोला लाया और उसमें कछुये को उठा कर रख लिया | सियार ने  भालू से कहा - ' इस झोले का मुंह बांध कर रख मैं अपने घर में रख देता हूं और हम घूम फिर कर देखते हैं कोई और शिकार | हो सकता है हमें कोई दूसरा शिकार भी मिले | ' सियार और भालू की कारस्तानी खरगोश देख रहा था | उसने कछुये  को बचाने की सोंची | वह भालू और सियार से थोड़ी  दूर खड़े हो कर चिल्लाया - ' अरे देखो ...देखो ...खेत की फसल हिरण खा रहे हैं | ' और दौड़ा खरगोश खेत की तरफ | खरगोश की बात सुनते ही भालू और सियार के मुंह में पानी भर आया | ' अरे ! आज तो हिरण का मॉस खाने को मिलेगा | ' वे दोनों खेत की और दौड़ पड़े | खरगोश रास्ता बदल कर सियार के घर आया और  झोले का मुंह खोल दिया |  कछुआ झोले से बाहर निकल आया और खरगोश को धन्यवाद दिया | कछुये ने कहा - ' उसकी मुसीबत में  वह भी जरूर उसकी सहायता करेगा | ' अब खरगोश मधुमक्खियों  के पास गया | वह उनसे भालू और सिया...

सुविधाजनक आकांक्षाएं और भय

एक बार एक बटोही अकेले शहर की ओर अपने मित्र से काम की तलाश में मिलने जा रहा था | गर्मी का मौसम था | राह में कोई छायादार पेड़ न था | प्यासा बटोही चलता जा रहा था | सामने उसे एक पेड़ दिखाई दिया | बटोही ने सोंचा - इसी पेड़ के नीचे विश्राम कर लेता हूं | बटोही बरगद के पेड़ के नीचे बैठ गया | बटोही ने सोचा - काश मुझे पानी मिल जाता | तभी बटोही ने देखा एक ग्रामीण उसकी ओर आ रहा है | उसके हाथ में जल भरा लोटा है | पेड़ के नीचे रुके बटोही को देख उस ग्रामीण ने उसे पानी पिला दिया | थोड़ी देर में बटोही को भूख लगी | उसने सोंचा - काश कोई उसे भोजन करा देता | थोड़ी देर में बटोही ने देखा कि जिस ग्रामीण ने उसे पानी पिलाया था वही थाली में भोजन और एक लोटे में पानी ले कर उसकी ओर आ रहा है | बड़े प्यार से उस ग्रामीण ने बटोही को  भोजन कराया और पानी पिलाया | बटोही भजन कर कर के तृप्त हुआ | फिर उसने सोंचा - अभी तो दोपहर है सिर पर सूरज तप रहा है | काश खाट मिल जाती और वह थोड़ी झपकी ले लेता | तभी बटोही ने देखा कि वही ग्रामीण एक खाट ले के उसकी ओर आ रहा है | बटोही को लेटने के लिये अब खाट भी मिल गयी थी | बटोही खाट पर लेट गया और ...

बकरे की मां

16 October 2015 13:00 -इंदु बाला सिंह  बिर्जन ने बकरी पाली थी | बकरी और मेमना खूब खेलते थे | धीरे धीरे कुछ महीनों में मेमना एक हृष्ट पुष्ट बकरा बन गया | अब बकरी को चिंता होने लगी |  बकरी ने सोंचा - जरूर एक दिन मालिक मेरे मेमने को इतना हृष्ट देख किसी दिन काट कर खा जायेगा | एक रात बकरी ने अपने मेमने को समझाया - ' देख बेटा ! तू बड़ा हो गया है | किसी दिन भी मालिक तुझे काट कर पकायेगा अपनी रसोईं में और फिर खा लेगा | देख बेटा ! तू जंगल में भाग जा | वहां तुझे खाने के लिये पौधों के हरे पत्ते मिलेंगे और पीने के लिये नदी का ठंडा जल | वहां तू खूब घूमना और खुश रहना | ' और रात में ही बकरी ने अपने मेमने की रस्सी दांत से चबा चबा कर तोड़ डाली | दुखी मन से बकरे की माँ ने अपने प्राणप्यारी सन्तान को आशीर्वाद दे कर विदा कर दिया |   सुबह बिर्जन ने देखा -  बकरा खूंटे पर नहीं है |  बिर्जन ने  अपना माथा पीट लिया |

सबसे शक्तिशाली शस्त्र

एक दिन राजा रूप राय अपने मत्री  के साथ अपने बाग में सबेरे सबेरे भ्रमण कर रहे थे | एकाएक उनके मन में एक प्रश्न कौंधा -  ' संसार में सबसे शक्तिशाली अस्त्र कौन सा है ? ' राजा ने अपने मंत्री से अपने मन में उठे प्रश्न का उत्तर जानना चाहा | प्रश्न सुन कर मंत्री सोंचने लगा - ' तलवार , बरछा , भाला सभी अस्त्र अपने अपने स्थान पर शक्तिशाली हैं | कोई अस्त्र तो किसी से कम नहीं | ' मंत्री को राजा के प्रश्न का कोई उत्तर न सुझा | हार कर मंत्री ने कहा -  ' राजन ! मुझे आपके प्रश्न का उत्तर पता करने के लिये थोड़ा समय दीजिये | ' राजा ने कहा - ' ठीक है | मैं तुम्हें सोंचने के लिये पन्द्रह दिन का समय देता हूं | ' अब मंत्री परेशान था | एक एक दिन बीत रहे थे पर उत्तर न मिल रहा था मंत्री को राजा के प्रश्न का | एक दिन सुबह सुबह मंत्री नदी में नहा कर अपने लोटे से सूर्य देवता को जल चढ़ाया और लौट रहा था तभी राह में हल्ला हुआ - ' भागो ! भागो ! ' मंत्री ने पीछे मुड़ कर देखा कि सब इधर उधर भाग रहे हैं और एक सांड उनकी ओर दौड़ता हुआ चला आ रहा है |  सांड मत्री के नजदीक पहुंच चूका था | म...

अकृतज्ञता की सजा

एक जंगल में एक साधू रहता था ।  साधू अपनी अपनी कुटिया में मनन चिंतन में लीन रहता था । एक दिन जब साधू समाधिस्थ था तब एक चूहा साधू के शरीर पर उपर नीचे होने लगा ।  साधू की समाधि टूट गयी । ' क्या बात है ? तुम्हे क्या चाहिये ? ' - वे चूहे को देख हंस कर बोले । ' महात्मन् ! मैं बहुत छोटा हूं । मुझे बिल्ली से बड़ा डर लगता है । आप मुझे बिल्ली बना दीजिये । ' चूहे ने हाथ जोड़ कर कहा । साधु ने कहा - ' तथास्तु ' और पल भर में चूहा बिल्ली बन गया । कुछ दिन बाद बिल्ली बना चूहा फिर साधु के सामने हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया - ' महात्मन् ! जंगल में शेर सबसे शक्तिशाली है और मुझे शेर से डर लगता है । कृपा कर के आप मुझे शेर बना दीजिये । ' साधू मन ही मन मुस्काये फिर उन्होंने कहा - ' तथास्तु ' पल भर में चूहा शेर बन गया और दहाड़ते हुये साधू की कुटिया से चला गया । बहुत दिनों के बाद एक बार साधू जंगल से शहर की और जा था तभी राह में उसे चूहे से बना शेर मिल गया । साधू को देख शेर दहाड़ा बोला - 'आज मुझे बहुत भूख लगी है मैं तुझे खाऊंगा । ' चूहे की अकृतज्ञता देख साधू बहुत दुखी हुआ । ...

ज्ञानी गृहस्थ

एक  फकीर था । वह  प्रतिदिन एक गांव जाता था और  वहां के किसी मेहनतकश , ईमानदार और   धनी व्यक्ति के घर भोजन करता था ।  इसी क्रम में एक दिन  माणिक लाल के घर पहुंचा ।  माणिक लाल ने फकीर को बड़े  प्यार से  आसन दिया ।  उसके सामने विभिन्न प्रकार के पकवान परोसा ।  भोजन शुरू करने से पहले फकीर ने माणिक लाल की सम्पत्ति जानने चाही । फिर उसने माणिक लाल  पुत्रों के बारे में जानना चाहा ।  माणिक लाल ने कहा  - ' अतिथि महोदय ! मेरी  संतान है और मेरे पास एक हजार  मुद्रायें हैं । ' इतना सुनते ही फकीर आग बबूला हो उठा ।  ' नीच ! तू सच बोलता तो क्या मैं तेरा धन ले लेता ।  सुना है कि तेरे पास अपरम्पार धन सम्पत्ति है । तेरे  चार पुत्र हैं । मैं  अन्न ग्रहण नहीं कर सकता । ' फकीर कुपित हो कर   बोला ।  माणिक लाल ने नम्रता  पूर्वक  कहा कि महोदय ! आप मेरी बात सुन लें फिर आप मुझे झूठा साबित  चाहें तो वह आपकी मर्जी ।  ' महोदय ! मेरे चार पुत्र हैं । इनमे से मेरे तीन पुत्र पियक्क्ड़...

गंवई चूहा

दो मित्र चूहे थे । दोनों गांव में रहते थे । एक दिन शहर से आयी एक कार गांव में । एक चूहा कार को देखने चढ़ गया उसके अंदर । नई कर वह खुश हुआ । इसी बीच कार का ड्राइवर आया और कार ले कर चल पड़ा । अब परेशान हो गया चूहा । उसे पता ही नही चल रहा था की वह कहां जा रहा है । एक जगह जैसे ही कार रुकी चूहे की जान में जान आयी । ड्राईवर कार का दरवाजा ज्यों ही खोला चूहा पलक झपकते ही बाहर निकल कर भागा । बचते बचाते चूहा एक होटल में पहुंच गया । रात का समय था । जूठे बर्तनों का ढेर था । प्लेटों में पड़े जूठन खा कर पेट भरा चूहा और फिर लकड़ी के डब्बों के ढेर में दुबक गया । अब चूहे को अपना घर गांव व मित्र याद आने लगे । दिन बीतते गये । अब वह पूरा शहरी हो गया था । वह मोटा चमकीली आंखोंवाला शहरी चूहा अब बलिष्ठ हो चुका था । बहुत दिनों बाद शहरी चूहे को अपने गांव और माता पिता की याद आयी । आखिर एक दिन राह ढूंढते ढूंढते वह अपने गांव पहुंच ही गया । गांव पहुंचने पर शहरी चूहे ने देखा कि उसके माता पिता भाई बहन कोई नहीं हैं । अपने मित्र चूहे से गांव की कथा सुन बड़ा दुखी हुआ चूहा । गंवई चूहे का परिवार बड़े कष्ट में जी रहा था । गंवई च...

सूरज और हवा

एक बार सूरज और चाँद में झगड़ा हो गया । सूरज बोला मैं सबसे बड़ा हवा बोली मैं सबसे बड़ी । सूरज ने कहा कि देखो वो बटोही जा रहा है ।  जो भी  उसका कोट उतरवा देगा वो बड़ा  कहलायेगा । ‘ लगाओ शर्त ‘ सूरज ने कहा । हवा ने ख़ुशी ख़ुशी शर्त लगा लगा ली । अब हवा जोर से बहने लगी । हवा जितने जोर  से बहती उतने जोर से बटोही अपने कोट को  खुद से दबा लेता । हवा बटोही से उसका कोट  उतरवा न पायी । अब सूरज ने कहा कि देखो मैं बटोही से उसका  कोट पल भर में उतरवाता हूं । अब सूरज पूरी तेज़ी से चमका । चारों तरफ़  इतनी गर्मी बढ़ी कि बटोही पसीने से नहा उठा  । हार कर उसने अपना कोट उतार कर अपने  हाथ में पकड़ लिया ।

मूर्ख मित्र

किसी राजा के राजमहल में एक बन्दर सेवक के रुप में रहता था । वह राजा का बहुत विश्वास-पात्र और भक्त था । अन्तःपुर में भी वह बेरोक-टोक जा सकता था । एक दिन जब राजा सो रहा था और बन्दर पंखा झल रहा था तो बन्दर ने देखा, एक मक्खी बार-बार राजा की छाती पर बैठ जाती थी । पंखे से बार-बार हटाने पर भी वह मानती नहीं थी, उड़कर फिर वहीं बैठी जाती थी । बन्दर को क्रोध आ गया । उसने पंखा छोड़ कर हाथ में तलवार ले ली; और इस बार जब मक्खी राजा की छाती पर बैठी तो उसने पूरे बल से मक्खी पर तलवार का हाथ छोड़ दिया । मक्खी तो उड़ गई, किन्तु राजा की छाती तलवार की चोट से दो टुकडे़ हो गई । राजा मर गया । "मूर्ख मित्र की अपेक्षा विद्वान्‌ शत्रु ज्यादा अच्छा होता है।"

दुष्ट सर्प और कौए

एक जंगल में एक बहुत पुराना बरगद का पेड़ था। उस पेड़ पर घोंसला बनाकर एक कौआ-कव्वी का जोड़ा रहता था। उसी पेड़ के खोखले तने में कहीं से आकर एक दुष्ट सर्प रहने लगा। हर वर्ष मौसम आने पर कव्वी घोंसले में अंडे देती और दुष्ट सर्प मौक़ा पाकर उनके घोंसले में जाकर अंडे खा जाता।  एक बार जब कौआ व कव्वी जल्दी भोजन पाकर शीघ्र ही लौट आए तो उन्होंने उस दुष्ट सर्प को अपने घोंसले में रखे अंडों पर झपटते देखा। अंडे खाकर सर्प चला गया कौए ने कव्वी को ढाडस बंधाया 'प्रिये, हिम्मत रखो। अब हमें शत्रु का पता चल गया हैं। कुछ उपाय भी सोच लेंगे।'  कौए ने काफ़ी सोचा विचारा और पहले वाले घोंसले को छोड़ उससे काफ़ी ऊपर टहनी पर घोंसला बनाया और कव्वी से कहा 'यहां हमारे अंडे सुरक्षित रहेंगे। हमारा घोंसला पेड़ की चोटी के किनारे निकट हैं और ऊपर आसमान में चील मंडराती रहती हैं। चील सांप की बैरी हैं। दुष्ट सर्प यहां तक आने का साहस नहीं कर पाएगा।'  कौवे की बात मानकर कौव्वी ने नए घोंसले में अंडे दिए जिसमे अंडे सुरक्षित रहे और उनमें से बच्चे भी निकल आए। उधर सर्प उनका घोंसला ख़ाली देखकर यह समझा कि उसके डर से कौआ कव्व...

झूठा चरवाहा

एक चरवाहा बच्चा था । वह रोज़ पहाड़ पर भेड़ें चराने जाता था । एक दिन चरवाहे के मन में आया कि देखूँ भेड़िया आया भेड़िया आया चिल्लाने पर गाँव से लोग उसकी मदद करने आते हैं या नहीं । और चरवाहा ज़ोर ज़ोर से चिल्लाया - थोड़ी ही देर में गाँव के लोग बरछा , भला , डंडा लिये दौड़ते आये ।  आने पर उन्हें पता चला कि चरवाहा लड़का झूठ बोल रहा है । ग़ुस्सा  से गाँववाले लौट गये ।  कुछ दिन बाद जब चरवाहा लड़का भेड़ें चरा रहा था तब   सच मुच का भेड़िया आया । चरवाहा बच्चा बहुत  चिल्लाया -  भेड़िया आया ! भेड़िया आया ! उस बच्चे को बचाने कोई भी आदमी  गाँव से नहीं आया  । उनको लगा चरवाहा खेला कर रहा है । और भेड़िया लड़के को खा गया ।

बेइमानी का फल

रमन बहुत ईमानदार था । ईमानदारी के कारण उसे काम से निकाल दिया था । वह दुखी मन से घर लौट रहा था । रास्ते में उसे एक बूढ़ा आदमी मिला । वह तीन झोले ले कर चल रहा था । रमन को देख उस बूढ़े आदमी ने कहा - ‘ क्या तुम मेरा एक झोला उठा सकते हो ? मुझे पास के ही गाँव में जाना है ।’ ‘ हाँ हाँ क्यों नहीं! ‘ रमन ने कहा और बूढ़े का झोला उसके हाथ से ले लिया । रमन आगे चल रहा था पीछे पीछे बूढ़ा । कुछ दूर चलने के बाद रमन ने पूछा आख़िर इस झोले में क्या है ? बूढ़े ने कहा कि इसमें तांबे के सिक्के हैं । रास्ते में नदी पड़ी । रमन आगे बढ़ा पर बूढ़ा नदी के किनारे ही खड़ा रहा । रमन ने पानी में चलने को कहा तो बूढ़े ने कहा मैं इन दो झोलों के बोझ के साथ नदी नहीं पार कर सकता । अगर तुम मेरा दूसरा झोला पकड़ लो तो मैं आसानी से नदी पार कर लूँगा । रमन ने ख़ुशी ख़ुशी दूसरा झोला भी पकड़ लिया । बूढ़ा आसानी से नदी पार कर लिया । थोड़ी दूर चलने के बाद रमन ने पूछा कि अब इस झोले में क्या है ? बूढ़े ने बताया कि इस झोले में चाँदी के सिक्के हैं । अब रमन और बूढ़ा दोनों आगे बढ़ चले । रमन के हाथ में दो झोले थे और बूढ़े के हाथ में एक झोला...

स्वार्थी बुढ़िया

एक बुढ़िया थी । उसने एक दिन एक भूखे को शकरकंदी दान की थी । वह जब गुजरी तो यमदूत उस के दान के पुण्य के फलस्वरूप उसे स्वर्ग ले चले ।  उस समय हर मृत व्यक्ति उस बुढ़िया का पैर पकड़ कर लटक गया । यह देख बुढि़या के मन में स्वार्थ जागा। उसने सोचा - अपने दान के पुण्य के बल पर वह स्वर्ग जा रही है । और उसके सहारे अन्य व्यक्ति भी जा रहे हैं।  बुढ़िया की ऐसी स्वार्थपूर्ण भावना के कारण यमदूत ने उसे नर्क में फेंक दिया । बाकी व्यक्ति भी नर्क में गिर पड़े ।