सुविधाजनक आकांक्षाएं और भय
एक बार एक बटोही अकेले शहर की ओर अपने मित्र से काम की तलाश में मिलने जा रहा था |
गर्मी का मौसम था | राह में कोई छायादार पेड़ न था | प्यासा बटोही चलता जा रहा था |
सामने उसे एक पेड़ दिखाई दिया |
बटोही ने सोंचा -
इसी पेड़ के नीचे विश्राम कर लेता हूं |
बटोही बरगद के पेड़ के नीचे बैठ गया |
बटोही ने सोचा -
काश मुझे पानी मिल जाता |
तभी बटोही ने देखा एक ग्रामीण उसकी ओर आ रहा है | उसके हाथ में जल भरा लोटा है | पेड़ के नीचे रुके बटोही को देख उस ग्रामीण ने उसे पानी पिला दिया |
थोड़ी देर में बटोही को भूख लगी | उसने सोंचा -
काश कोई उसे भोजन करा देता |
थोड़ी देर में बटोही ने देखा कि जिस ग्रामीण ने उसे पानी पिलाया था वही थाली में भोजन और एक लोटे में पानी ले कर उसकी ओर आ रहा है |
बड़े प्यार से उस ग्रामीण ने बटोही को भोजन कराया और पानी पिलाया |
बटोही भजन कर कर के तृप्त हुआ | फिर उसने सोंचा -
अभी तो दोपहर है सिर पर सूरज तप रहा है | काश खाट मिल जाती और वह थोड़ी झपकी ले लेता |
तभी बटोही ने देखा कि वही ग्रामीण एक खाट ले के उसकी ओर आ रहा है |
बटोही को लेटने के लिये अब खाट भी मिल गयी थी |
बटोही खाट पर लेट गया और सोंचा -
जो मैं सोंचता हूं वह हो जाता है | इस सूनी जगह में मुझे आरामदायक सुविधायें मिल गयीं |
उसे ज्ञान न था कि वह कल्पवृक्ष के नीचे आराम कर रहा है | वही कल्पवृक्ष जो अपने नीचे खड़े हर व्यक्ति की मनोकामना पूरी करता है |
अब वह डर गया |
अगर यहाँ शेर आ जाये तो ?
और पल भर में एक शेर उसके सामने आ गया |
शेर ने एक दहाड़ मारी और बटोही को फाड़ कर खा गया |
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