दुष्टता की सजा
एक बार सियार और भालू किसी बात पर लड़ पड़े |
पल भर दोनों एक दुसरे के दुश्मन बन गये थे , तभी उनकी सामने से गुजरते कछुये पर पड़ी | दोनों की आंखें चमक गयीं |
सियार गांव से एक झोला लाया और उसमें कछुये को उठा कर रख लिया |
सियार ने भालू से कहा -
' इस झोले का मुंह बांध कर रख मैं अपने घर में रख देता हूं और हम घूम फिर कर देखते हैं कोई और शिकार | हो सकता है हमें कोई दूसरा शिकार भी मिले | '
सियार और भालू की कारस्तानी खरगोश देख रहा था | उसने कछुये को बचाने की सोंची |
वह भालू और सियार से थोड़ी दूर खड़े हो कर चिल्लाया -
' अरे देखो ...देखो ...खेत की फसल हिरण खा रहे हैं | ' और दौड़ा खरगोश खेत की तरफ |
खरगोश की बात सुनते ही भालू और सियार के मुंह में पानी भर आया |
' अरे ! आज तो हिरण का मॉस खाने को मिलेगा | '
वे दोनों खेत की और दौड़ पड़े |
खरगोश रास्ता बदल कर सियार के घर आया और झोले का मुंह खोल दिया |
कछुआ झोले से बाहर निकल आया और खरगोश को धन्यवाद दिया |
कछुये ने कहा -
' उसकी मुसीबत में वह भी जरूर उसकी सहायता करेगा | '
अब खरगोश मधुमक्खियों के पास गया | वह उनसे भालू और सियार की दुष्टता के बारे में बताया |
मधुमक्खियों ने खरगोश को सहायता करने की ठानी |
खरगोश ने मधुमक्खियों से सियार के झोले में घुस जाने को कहा | फिर खरगोश ने झोले का मुंह बांध दिया |
खरगोश ने मधुमक्खियों से कहा कि जैसे ही सियार झोले का मुंह खोलेगा तुम लोग मिल के काटना भालू और सियार को |
और खरगोश वहां से चला गया |
खेतों में हिरण न मिला भालू और सियार को | वे दुखी मन से लौटे |
' कोई बात नहीं घर में कछुआ है न | ' सियार ने भालू से कहा |
सियार ने ज्यों ही झोले का मुंह खोला झोले में बंधी मधुमक्खियां निकलीं और सियार और भालू पर टूट पड़ीं |
भालू और सियार चीखते हुये भागे |
Comments
Post a Comment