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टिड्डा और केंचुआ

बात उस ज़माने की है जब टिड्डा और केंचुआ  दोनों जमीन पर चलते थे |टिड्डा की आदत थी हमेशा उछलना उड़ने की चेष्टा करना | केंचुआ  उस पर हँसता था  | वह कहता था कि वे दोनों जमीन पर रेंगनेवाले जीव हैं | अत: उसे इस तरह की बेवकूफी नहीं करनी चाहिए | उसे भी जमीन पर रेंगना चाहिए और उसकी तरह  मस्त रहना चाहिए | पर टिड्डा उसकी बात कभी नहीं सुना | वह हमेशा उड़ने की कोशिश करता रहा और केंचुआ जमीन पर रेंगता रहा | एक बार टिड्डा ने इतनी जोर की उछाल मारी की वह एक छोटे पेड़ की टहनी पर पहुँच गया | अब टिड्डा  बड़ा खुश हो गया | वह एक टहनी से दूसरी टहनी पर कूदने लगा | केंचुए ने उसे आश्चर्य से देखा | कुछ दिनों बाद बरसात का मौसम आ गया | बरसा होने लगी टिड्डा  उड़ कर पेड़ की पत्तियों में छुप गया | पर केंचुआ भीजने लगा | अपने को बचाने के लिए वह मिट्टी में घुसने की चेष्टा करने लगा | तब से टिड्डा पेड़ पर रहता है और केंचुआ जमीन में |

पर उपदेश बहुतेरे

एक गाँव में एक पंडित और पंडिताईन रहते थे | पंडित जी का बड़ा नाम था | वे जगह जगह प्रवचन  देते थे पर उनकी पत्नी को बहुत अफ़सोस था कि वह उस प्रवचन को नहीं सुन पाती है | एक बार पंडित जी का प्रवचन उन्हीं के गाँव में था | पत्नी ने सोंचा की चूँकि इस बार प्रवचन अपने गाँव में है इस लिए वह जरूर सुन पायेगी प्रवचन | पर उस दिन पंडित जी मछली लाये और उसे बढ़िया से पकाने बोले पत्नी को और प्रवचन देने चले गए | पूरा गाँव चला प्रवचन सुनने पर पंडिताईन न जा पाई | उसे बड़ा अफ़सोस हुआ |  पड़ोसन ने उसे प्रवचन सुनने चलने के लिए पुकारा तब पंडिताईन खुद को रोक न पाई | वह भी यह सोंच कर चल पड़ी पड़ोसन के साथ की वह जल्दी ही लौट आयेगी और खाना बना लेगी | पति के प्रवचन से मुग्ध हो गई पंडिताईन | वे अहिंसा पर वक्तव्य दे रहे थे | उदाहरण दे दे कर समझा रहे थे कि जीव हत्या पाप है | सभी श्रोता मंत्रमुग्ध थे |  पंडिताईन को एकाएक ख्याल आया कि उसे तो घर में खाना भी बनाना है | वह जल्दी जल्दी लौट पड़ी घर | पंडिताईन के सिर में पति के प्रवचन का इतना प्रभाव पड़ा कि उसने मछली उठा कर घर से बाहर फेंक दी और सादा खाना बना लिया | पंडित ...

ढेला पत्ता

ढेला पत्ता दोनों मित्र थे | आंधी आने पर ढेला पत्ते पर बैठ जाता था और उसे उड़ जाने से बचा लेता था |बर्षा आने पर पत्ता ढेले पर बैठ जाता था और ढेला गलने से बच जाता था | एक बार ढेला और पत्ता दोनों झगड़ पड़े दोनों ने एक दूसरे को सीख देने की ठानी | एक दिन जोर की आंधी आयी | ढेला पत्ते पर नहीं बैठा | पत्ता राम उड़ गए | दूसरे दिन जोर की आंधी आयी | ढेला राम गल गए |

चांद

चाँद ,  सूरज और हवा तीनों भाई बहन थे | उनकी माँ गरीब थी | एक बार उनकी धनी मौसी ने उन्हें अपने घर खाने पर बुलाया | तीनों भाई बहन खुश हो गए | आज के दिन उन्हें बढ़िया खाना मिलेगा | माँ ने उन्हें खुशी मन से भेज दिया बहन के घर | शाम को वे जब लौटे तो बड़े प्रसन्न थे | माँ ने पूछा कि क्या मिला वहाँ खाने में | बेटे सूरज और बहन हवा ने खाने की बड़ी प्रशंसा की | उन्होंने  कहा माँ वहाँ बड़ा अच्छा खाना बना था |वे उसे खा कर आज बहुत खुश हैं  | चाँद ने कहा की माँ खाना सच में बहुत अच्छा था | अपने खाने में से थोड़ा खाना छुपा कर तुम्हारे लिए भी लाया हूं | तुम खा कर देखो | माँ खा कर तृप्त हुई | उसने  चाँद को गले से लगा लिया और कहा आज जिस तरह तुमने सुख पहुंचाया है | तुम बहुत  बड़े बनोगे | तुम्हे देख कर लोग प्रसन्न  होंगे | तुम्हारी एक झलक पाने के लिए लोग अपने अपने घरों से निकल जायेंगे | सूरज , हवा को देखते ही लोग अपने घरों में छुप जायेंगे | तब से जब सूरज अपनी प्रखरता पर होता है और हवा खूब अपनी शक्ति दिखाती है तब लोग अपने अपने घरों में छुप जाते हैं | लेकिन चाँद जब अपनी पूर्णता म...

बैंगन का भरता

एक संयुक्त परिवार था | घर में चार बहुरानियाँ थीं | छोटी बहू का मन बहुत दिनों से बैंगन का भर्ता और भात खाने का कर रह था | पर बने कैसे ? सबका मन करे तब न बने | परेशान बहू ने एक दिन एक बैंगन चूल्हे में डाल कर भून लिया | किसी को पता भी न चला | एक अलग हंडी में उसने भात निकल कर रख लिया | अब बैंगन का भर्ता लहसुन मिर्च डाल कर खूब स्वादिष्ट मनालायक बना कर भात की हांडी में छुपा कर रख दिया | पर अब भला वो खाए कहाँ ? उसने सोंचा पूजा घर में कोई नहीं जाता है इस समय वहीं जा कर खा लेती हूँ | पूजा घर में बैठ कर बड़ी तृप्ति से वह खायी अपना भर्ता भात | खाने के बाद उसकी निगाह भगवान की मूर्ति पर पड़ी | उसने देखा भगवान ने आश्चर्य से अपने दांतों तले उंगली दबा ली है | उसने पूजा घर जूठा कर दिया था | छोटी बहू को बड़ा गुस्सा आया | ....मुझे खाने का मन था | मुझे कहीं जगह न मिली तुम्हारे घर आयी तो तुमको भी बुरा लग गया | गुस्से में उसने अपनी हंडी भगवान के मुंह पर दे मारी | भगवान के दांत से उनकी उंगली निकल गयी | अब बहू ने चैन की साँस ली |

बुद्धू

    एक घर में एक दस साल का लड़का और उसकी माँ रहते थे | गाँव वाले उसे बुद्धू के नाम से पुकारते थे | एक दिन उसकी माँ को बुखार आया | माँ का बदन गर्म देख कर वह डर गया | उसे समझ नहीं आया कि अब वह क्या करे | फिर एकाएक उसे याद आया कि जब उसकी टांगी धूप में पड़ी पड़ी गर्म हो गयी थी तब उसने टांगी को रस्सी से बांध कर कूएं में डुबा दिया था | कूंए से निकलने पर टांगी की गर्माहट खत्म हो गयी थी | बस उसने माँ के कमर  में मजबूती से रस्सी बांधी और उसे कूंए में डाल दिया | कुछ देर तक वह माँ को डुबाये रखा और फिर उसे  बाहर निकल दिया | अब वह यह देख कर वह  हैरान हो गया कि उसकी माँ की गर्दन लटक गयी है |  वह बैठकर जोर जोर से रोने लगा |   उसकी माँ मर चुकी थी |

पुस्तकीय ज्ञान

एक गाँव में चार मित्र रहते थे | तीन मित्र विद्या ग्रहण करने गुरुकुल में चले गये | चौथा मित्र गाँव में ही रह गया | कुछ वर्ष पश्चात् वे विद्या अध्ययन कर गाँव लौटे | चरों मित्र खूब घूमे कुछ दिन साथ रहे | एक दिन उन्होंने सोंचा कि हमे अपनी विद्या का उपयोग कर धन कमाने शहर जाना चाहिए | चौथा मित्र कहने लगा कि वह भी उनके साथ जाएगा | पर तीनो मित्र मना करने लगे | उनका कहना था कि चूंकि वे विद्या ग्रहण किये हैं तो वे कमाएंगे अब चौथा मित्र जो अनपढ़ है वह कैसे उनके साथ जा सकता है | चौथा मित्र दुखी हो गया | अपने मित्र को दुखी देख तीनों मित्रों ने उसे भी साथ ले लिया | गमछे में चना और गुड़ बांध कर वे चले | कुछ दूर चलने के बाद  रास्ते में एक जंगल पड़ा | चारों मित्र एक पेड़ के नीचे आराम करने लगे | एक एक उनकी निगाह अस्थि समूह पर पड़ी |  " अरे ! ये तो बाघ की हड्डियाँ लगती हैं | " चौथे मित्र ने कहा  " मुझे हड्डियां जोड़नी आती हैं | " पहले मित्र ने ज्ञान बघारा | और उसने हड्डियाँ जोड़ दीं | " मुझे हड्डियों पर मांस पेशी चढ़ाना आता है | " दुसरे मित्र ने भी अपने ज्ञान का परिचय दिया | और उसने...